श्री कृष्ण जन्माष्टमी (गोकुलाष्टमी व दंडी महोत्सव)
भगवान विष्णु के आठवें पूर्ण अवतार, धर्म के रक्षक और गीता के उपदेशक योगेश्वर श्री कृष्ण के प्राकट्य दिवस के रूप में जन्माष्टमी मनाई जाती है। भाद्रपद कृष्ण अष्टमी की आधी रात को रोहिणी नक्षत्र में मथुरा के कारागार में प्रभु का जन्म हुआ था। इस दिन भक्त दिनभर उपवास रखते हैं, घरों में सुंदर झांकियां सजाते हैं, लड्डू गोपाल को पालने में झुलाते हैं और मध्यरात्रि 12:00 बजे जन्मोत्सव मनाकर माखन-मिश्री का भोग लगाते हैं।
इस साल का शुभ मुहूर्त एवं समय (2026)
वैदिक सूर्य सिद्धांत व पंचांग गणना अनुसार प्रमाणित
रात 11:58 से मध्यरात्रि 12:44 तक (निशीथ काल जन्मोत्सव)
अति शुभ व श्रेष्ठ समयतिथि विवरण: 03 सितंबर 2026, शाम 07:12 बजे से • समाप्ति: 04 सितंबर 2026, शाम 05:40 बजे तक
कब-कब क्या करना है? संपूर्ण समय-सारणी व पूजा विधि
प्रातः काल स्नान से लेकर मुख्य पूजा, दीप प्रज्वलन व रात्रि अनुष्ठान तक की सटीक समय सारणी
स्नान व उपवास संकल्प
प्रातः 06:00 - 08:00 AMप्रातः स्नान कर फलाहार या निर्जला उपवास का संकल्प लें। मंदिर व बाल गोपाल के झूले की सजावट करें।
झांकी दर्शन व हरिनाम संकीर्तन
दिनभर (सुबह से शाम)भगवान की बाल लीलाओं की झांकी सजाएं। "हरे कृष्ण हरे कृष्ण" महामंत्र का जप करें।
खीरा चीरा (जन्मोत्सव पूर्व)
रात 11:30 PMडंठल वाले खीरे में सिक्के से कट लगाकर बालगोपाल को उसमें विराजमान करें।
मध्यरात्रि जन्मोत्सव व महाभिषेक
रात 11:58 - 12:44 AMशंख, घंटी और नगाड़ों के साथ ठीक 12 बजे प्रभु का प्राकट्य करें। पंचामृत और गंगाजल से महाभिषेक कर नवीन वस्त्र पहनाएं। झूले में झुलाएं और माखन-मिश्री व धनिए की पंजीरी का भोग लगाएं।
दही हांडी व पारण
अगले दिन सुबहनंदोत्सव मनाएं, खिलौने व मिठाई बांटें और व्रत का पारण करें।
यह पर्व या व्रत क्यों मनाया जाता है?
भगवान विष्णु के आठवें पूर्ण अवतार, धर्म के रक्षक और गीता के उपदेशक योगेश्वर श्री कृष्ण के प्राकट्य दिवस के रूप में जन्माष्टमी मनाई जाती है। भाद्रपद कृष्ण अष्टमी की आधी रात को रोहिणी नक्षत्र में मथुरा के कारागार में प्रभु का जन्म हुआ था। इस दिन भक्त दिनभर उपवास रखते हैं, घरों में सुंदर झांकियां सजाते हैं, लड्डू गोपाल को पालने में झुलाते हैं और मध्यरात्रि 12:00 बजे जन्मोत्सव मनाकर माखन-मिश्री का भोग लगाते हैं।
धार्मिक मान्यताएं एवं परंपराएं
लड्डू गोपाल को खीरे के भीतर से प्रकट करने की परंपरा है, जो माता के गर्भ से शिशु के जन्म (नाल छेदन) का प्रतीक है। पंचामृत से अभिषेक कर पीले वस्त्र, मोर मुकुट और बांसुरी अर्पित की जाती है। अगले दिन महाराष्ट्र में भव्य "दही हांडी" उत्सव आयोजित होता है।
संपूर्ण पौराणिक व्रत कथा एवं प्रसंग
पुराणों व सनातन धर्मग्रंथों में वर्णित प्रामाणिक कथा
मथुरा का क्रूर राजा कंस अपनी चचेरी बहन देवकी से बहुत स्नेह करता था। देवकी के विवाह के समय आकाशवाणी हुई: "हे कंस! जिस बहन को तू बड़े लाड़ से विदा कर रहा है, उसी का आठवां पुत्र तेरा वध करेगा।" भयभीत कंस ने देवकी और वासुदेव को कारागार में डाल दिया और उनके छह नवजात शिशुओं को मार डाला। सातवें गर्भ (बलराम) को योगमाया ने रोहिणी के गर्भ में स्थानांतरित कर दिया।
जब आठवें पुत्र के रूप में स्वयं भगवान श्री कृष्ण का अवतार हुआ, तो कारागार के सारे पहरेदार सो गए और ताले स्वतः खुल गए। वासुदेव जी नवजात कृष्ण को टोकरी में रखकर उफनती यमुना पार कर गोकुल में नंद-यशोदा के घर छोड़ आए और उनकी नवजात कन्या (योगमाया) को ले आए। जब कंस ने उस कन्या को मारना चाहा, तो वह आकाश में उड़कर बोली: "कंस! तुझे मारने वाला गोकुल में प्रकट हो चुका है।"
कहाँ-कहाँ देश व विदेश में कैसे मनाया जाता है?
भारत के विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय परंपराएं एवं विदेशों में भारतीय समुदाय का उत्सव
मथुरा की जन्मभूमि और वृंदावन के मंदिरों में 24 घंटे कीर्तन होता है। महाराष्ट्र में "गोविंदा आला रे" के नारों के साथ बहुमंजिला दही हांडी तोड़ी जाती है। दक्षिण भारत में चावल के आटे से बाल कृष्ण के छोटे-छोटे पग चिह्न घर के द्वार से मंदिर तक बनाए जाते हैं।
इस्कॉन के विश्वभर के केंद्रों (लंदन, न्यूयॉर्क, लॉस एंजिल्स, सिडनी, मॉस्को) में लाखों विदेशी भक्त महाभिषेक और कीर्तन में झूमते हैं।
पूजा सामग्री सूची (चेकलिस्ट)
पूजा की तैयारी करते समय वस्तुओं पर टिक करें
विशेष मंत्र, स्तोत्र व जप
पूजा व व्रत के नियम: क्या करें और क्या न करें
- ✓ प्रभु के भोग में तुलसी दल अनिवार्य रूप से रखें (बिना तुलसी के कृष्ण भोग नहीं लेते)
- ✓ मध्यरात्रि 12 बजे ही जन्मोत्सव मनाएं
- ✓ झूला श्रद्धा से झुलाएं
- ✗ अन्न या चावल का सेवन न करें
- ✗ बिना स्नान के लड्डू गोपाल को न छुएं
श्री कृष्ण जन्माष्टमी (गोकुलाष्टमी व दंडी महोत्सव) की आगामी तिथियां (2026 से 2030)
भक्तों व परिवारों की अग्रिम योजना हेतु 5-वर्षीय पंचांग सारणी
| वर्ष | दिनांक (Date) | वार (Day) | तिथि | पंचांग |
|---|---|---|---|---|
| 2026 | 04 September 2026 | शुक्रवार | भाद्रपद मास, कृष्ण पक्ष अष्टमी (रोहिणी नक्षत्र) | पंचांग |
| 2027 | 25 August 2027 | बुधवार | भाद्रपद मास, कृष्ण पक्ष अष्टमी (रोहिणी नक्षत्र) | पंचांग |
| 2028 | 11 September 2028 | सोमवार | भाद्रपद मास, कृष्ण पक्ष अष्टमी (रोहिणी नक्षत्र) | पंचांग |
| 2029 | 31 August 2029 | शुक्रवार | भाद्रपद मास, कृष्ण पक्ष अष्टमी (रोहिणी नक्षत्र) | पंचांग |
| 2030 | 21 August 2030 | बुधवार | भाद्रपद मास, कृष्ण पक्ष अष्टमी (रोहिणी नक्षत्र) | पंचांग |
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