श्री भैरव संकट हरन, मंगल करन कृपाल। करहु कृपा निज दास पर, दीन दयाल दयाल॥
जय जय श्री भैरव बलवाना। काल रूप त्रिभुवन में जाना॥
शिव के अंश प्रगट जग आए। देव दनुज सब शीश नवाए॥
डमरू त्रिशूल हाथ में सोहै। वाहन श्वान रूप मन मोहै॥
काल भैरव बटुक भैरवा। असितांग भैरव सुख करवा॥
क्रोध भैरव कपाली नामा। भीषण भैरव पूरण कामा॥
संहार भैरव उन्मत्त रूपा। अष्ट भैरव महिमा अनूपा॥
काशी के कोतवाल कहाए। बाबा विश्वनाथ मन भाए॥
काशी में जो कोई आवै। दर्शन भैरव प्रथम पावै॥
काल दंड तव हाथ विराजा। पापी थर थर कांपै राजा॥
शत्रु नाश कीजै तत्काला। कृपा करहु हे दीन दयाला॥
भूत प्रेत पिशाच भगावै। भैरव नाम जो मुख से गावै॥
राहु केतु शनि ग्रह बाधा। मिटि जावै प्रभु तव प्रसादा॥
कोर्ट कचहरी में जय पावै। जो नर भैरव चालीसा गावै॥
आरोग्य बल काया पावै। बिगड़े काज सकल बन जावै॥
तेल सिन्दूर समर्पण कीजै। मदिरा भोग प्रेम से दीजै॥
उड़द के बड़े जो भोग लगावै। भैरव कृपा सो निश्चय पावै॥
रविवार को व्रत जो राखै। सो अमृत फल जीवन चाखै॥
दीन मलीन अनाथ सहारा। भैरव देव तुम हो रखवारा॥
सदा रहौं मैं शरण तुम्हारी। रक्षा करहु हे नाथ बलिहारी॥
दुःख दरिद्र नहिं निकटै आवै। मंगल मोद प्रमोद बढावै॥
जो यह पाठ करै चालीसा। होय प्रसन्न काल के ईशा॥
नित्त नेम करि पाठ सुनावै। सो नर मनवांछित फल पावै॥
अद्भुत महिमा प्रभु तिहारी। वंदन करत सकल संसारी॥
काशी धाम विराजत देवा। सुर नर मुनि सब करहिं सेवा॥
काम क्रोध मद लोभ नशावहु। सात्विक भाव हृदय उपजावहु॥
रोग कष्ट सब दूर भगावहु। आरोग्य बल विद्या दिलवावहु॥
संतान हीन को गोदी भरई। भैरव कृपा ते सब दुख टरई॥
निर्धन को धनवान बनावहु। बिगड़े काज हमारे संवारो॥
दीन दयाल सुनो विनती हमारी। संकट हरहु हमारे भारी॥
तुम बिन कोई नहिं रखवाला। सुन लीजै विनती कृपाला॥
जय भैरव जय जय सुखदाता। भक्त जनों के भाग्य विधाता॥
शरण तुम्हारी आयो स्वामी। तुम हो घट घट अंतरयामी॥
आरती करौं तुम्हारी देवा। सदा करहु भक्तन की सेवा॥
प्रेम भक्ति रस अन्तर नाचे। भैरव नाम जो सांचे बांचे॥
सकल मनोरथ पूरण कीजै। निज पद भक्ति प्रेम रस दीजै॥
आरोग्य बल विद्या दीजै। दास जानि अपना करि लीजै॥
भैरव चालीसा पाठ समाप्ता। सब विधि मंगल होय प्रभाता॥
जय जय जय श्री भैरव राऊ। राखहु लाज सुनो गणराऊ॥
महाकाल के प्रिय अवतारी। जय जय भैरव मंगलकारी॥
भैरव चरण में शीश झुकाऊं। जनम जनम प्रभु गुण मैं गाऊं॥
भैरव चालीसा जो पढ़ै, मन में निश्चय धारि। काल भय मिटै शत्रु हटे, रक्षा करहिं पुरारि॥