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BHAKTI KI SHAKTI
🔱 भगवान शिव

पशुपतास्त्रेय स्तोत्र

पशुपतास्त्रेय स्तोत्र सनातन धर्म का अत्यंत पावन और चमत्कारी वैदिक स्तोत्र है। शिव महापुराण में वर्णित यह स्तुति भगवान शिव के परम स्वरूप, अनुग्रह और संकटमोचक सामर्थ्य का गुणगान करती है।

रचयिता भगवान सदाशिव / महर्षि वेदव्यास
स्रोत / ग्रन्थ शिव महापुराण
शुभ दिन / तिथि सोमवार, प्रदोष व्रत, महाशिवरात्रि
जप माला रुद्राक्ष माला - 1, 3 अथवा 11 पाठ
श्लोक संख्या 1 ॥ श्री ॥
ॐ नमो भगवते महापाशुपताय अतुलवीर्यपराक्रमाय त्रिनेत्राय शूलपाणये नमः ॥ १ ॥
हिंदी भावार्थ: पशुपतास्त्रेय स्तोत्र (श्लोक 1): अतुलनीय पराक्रम वाले, त्रिनेत्र, त्रिशूलधारी देवाधिदेव महापाशुपत शिव को नमस्कार है।
श्लोक संख्या 2 ॥ श्री ॥
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं सर्वशत्रुविमर्दनाय पाशुपतास्त्राय हुं फट् स्वाहा ॥ २ ॥
हिंदी भावार्थ: पशुपतास्त्रेय स्तोत्र (श्लोक 2): समस्त शत्रुओं का मर्दन करने वाले दिव्य पाशुपतास्त्र महामन्त्र को स्वाहा।
श्लोक संख्या 3 ॥ श्री ॥
वज्रबाणशरासनधारिणे महाभैरवाय विकरालरूपाय सर्वोपद्रवशमनाय नमः ॥ ३ ॥
हिंदी भावार्थ: पशुपतास्त्रेय स्तोत्र (श्लोक 3): वज्र के समान बाण और धनुष धारण करने वाले, विकराल रूपी महाभैरव को नमस्कार।
श्लोक संख्या 4 ॥ श्री ॥
सर्वग्रहबाधा-पिशाचबाधा-डाकिनीबाधा-नाशनाय महापाशुपताय नमः ॥ ४ ॥
हिंदी भावार्थ: पशुपतास्त्रेय स्तोत्र (श्लोक 4): समस्त ग्रहबाधा, पिशाचबाधा और नकारात्मक शक्तियों का नाश करने वाले पाशुपतास्त्र को नमस्कार है।
श्लोक संख्या 5 ॥ श्री ॥
रणे राजभये चोरे सर्पव्याघ्रभयेषु च । पाशुपतास्त्रस्मरणेन सर्वतो विजयो भवेत् ॥ ५ ॥
हिंदी भावार्थ: पशुपतास्त्रेय स्तोत्र (श्लोक 5): युद्ध में, राजभय में, चोर या हिंसक जीवों के भय में पाशुपतास्त्र का स्मरण करने से सर्वत्र विजय होती है।
श्लोक संख्या 6 ॥ श्री ॥
अस्त्रराज नमस्तुभ्यं महापाशुपताभिध । मम रक्षां कुरु क्षिप्रं त्राहि मां शरणागतम् ॥ ६ ॥
हिंदी भावार्थ: पशुपतास्त्रेय स्तोत्र (श्लोक 6): हे अस्त्रराज महापाशुपत! अपनी शरण में आए मेरी शीघ्र रक्षा कीजिए।
श्लोक संख्या 7 ॥ श्री ॥
य इदं पठते नित्यं पाशुपतास्त्रसंज्ञकम् । न तस्य जायते पीडा शत्रुभिर्वाग्रहैः क्वचित् ॥ ७ ॥
हिंदी भावार्थ: पशुपतास्त्रेय स्तोत्र (श्लोक 7): जो मनुष्य नित्य इस पाशुपतास्त्र स्तोत्र का पाठ करता है, उसे कभी शत्रुओं या अनिष्ट ग्रहों की पीड़ा नहीं सताती।
श्लोक संख्या 8 ॥ श्री ॥
सर्वत्र जयमाप्नोति सुखं च लभते सदा । अन्ते च शिवलोके स मोदते शाश्वतीः समाः ॥ ८ ॥ ॥ इति श्री पाशुपतास्त्र स्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
हिंदी भावार्थ: पशुपतास्त्रेय स्तोत्र (श्लोक 8): वह सर्वत्र विजय और सुख प्राप्त करता है तथा अंत में शिवलोक में नित्य निवास पाता है।
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संबंधित चालीसा, आरती, पूजन एवं पंचांग

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पाठ की दिव्य फलश्रुति व लाभ

  • ✓ भगवान शिव की अविरल कृपा, सुरक्षा और आत्मबल की प्राप्ति
  • ✓ अज्ञात भय, मानसिक तनाव, कलह और गृह दोषों का निवारण
  • ✓ कार्यक्षेत्र, व्यापार और विद्या में आने वाले विघ्नों पर विजय
  • ✓ नित्य पाठ से सकारात्मक ऊर्जा, सुख, शांति और सौभाग्य में वृद्धि
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स्तोत्र पाठ विधि एवं नियम

1
शुद्धि व स्नान
प्रातः काल स्नानोपरांत स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
2
आसन व दीप
पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख कर शुद्ध घी या तिल के तेल का दीपक जलाएं।
3
ध्यान व अर्पण
भगवान शिव का ध्यान कर पुष्प, चंदन, अक्षत और नैवेद्य अर्पित करें।
4
संकल्प व पाठ
हाथ में जल और अक्षत लेकर अपने मनोरथ का संकल्प करें और शांत मन से स्तोत्र का पाठ करें।
5
क्षमा प्रार्थना व समर्पण
पाठ उपरांत अज्ञानतावश हुई त्रुटियों के लिए क्षमा मांगें और आरती करें।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पशुपतास्त्रेय स्तोत्र का पाठ कब करना चाहिए? ▼

प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त अथवा संध्या काल में शुद्ध होकर सोमवार, प्रदोष व्रत, महाशिवरात्रि पर पाठ करना सर्वाधिक फलदायी माना गया है।

इस स्तोत्र के मुख्य लाभ क्या हैं? ▼

यह पाठ नकारात्मक ऊर्जा को दूर कर आत्मबल, शांति, सुरक्षा और अभीष्ट फल प्रदान करता है।