गरुड़ वाहिनी वैष्णवी, त्रिकूटा पर्वत वास।
करहु कृपा जगदम्बिके, पूरण कीजै आस॥
जय जय वैष्णो मात भवानी, महिमा अमित न जाय बखानी।
द्वार तुम्हारे जो नर आवै, मनवांछित फल सो जन पावै॥
जय जय वैष्णो मात भवानी। महिमा अमित न जाय बखानी॥
त्रिकूटा पर्वत वास तुम्हारा। भुवन चतुर्दश करे पसारा॥
भैरव नाथ दियो जब त्रासा। रूप विराट कियो परकासा॥
बाणगंगा प्रकटी सुखदानी। चरण पादुका महिमा मानी॥
गर्भ जून गुफा अति पावन। दर्शन करत होय मन भावन॥
हाथ चक्र त्रिशूल बिराजे। सिंह वाहिनी रूप सुसाजे॥
महालक्ष्मी महाकाली रूपा। महासरस्वती बुद्धि अनूपा॥
तीन पिंडी रूप विराजै। देव दनुज सब शीश निवाजै॥
श्रीधर भक्त की लाज बचाई। भंडारे में भीड़ लगाई॥
गोरखनाथ शिष्य जब आयो। भैरव हठ करि भोजन चाह्यो॥
मांस मदिरा माँगत अभिमानी। क्रोधित भईं तब मात भवानी॥
उड़ि पर्वत पर पहुँचीं माता। भक्तन की तुम भाग्य विधाता॥
नौ महीने गर्भ जून बिताए। भैरव पाछे पाछे आए॥
प्रकट भईं तब खड्ग संभारी। भैरव शीश काटि महतारी॥
भैरव घाटी शीश गिरायो। तब पापी पश्चाताप जनायो॥
दीन्हो वर माता सुखदानी। दर्शन पाछे तोहिं बखानी॥
जो नर मेरा दर्शन करिहै। भैरव दर्शन बिनु न तरिहै॥
अखंड ज्योति भवन में जागे। दूर दूर से भक्त अनुरागे॥
कटरा नगर सोहे अति पावन। चढ़त चढ़ाई मन भावन॥
अर्धकुंवारी गुफा सुहाई। सब संकट से पार कराई॥
हाथी मत्था संझा छत सोहे। भवन देखि सब जन मन मोहे॥
शीतल पवन चले सुखकारी। जय माता दी बोलहिं सारी॥
छत्र चंवर सुवर्ण के छाजै। घंट नाद मंदिर में बाजै॥
हलवा चना पुरी भोग लगावैं। नारियल चुनरी भेंट चढ़ावैं॥
जो जन तोहिं सुमिरे चित लाई। ताके काज सँवारे माई॥
संतान हीन सुपुत्रहि पावै। कोढ़ी का सब कोढ़ नशावै॥
निर्धन को धनवान बनावै। अंधा नयन प्रकाशहि पावै॥
कन्या पूजन जो जन करिहै। ताके घर भंडार भरिहै॥
भूत पिशाच निकट नहिं आवै। वैष्णो नाम जब गावै॥
रोग शोक सब दूर नशावै। सुख संपत्ति घर माहीं आवै॥
प्रेम सहित जो पाठ सुनावै। भवसागर से सो तर जावै॥
प्रातःकाल उठि जो जन ध्यावै। माता का दर्शन फल पावै॥
चालीसा जो पढ़े पढ़ावै। सो नर परम सिद्धि को पावै॥
जय जय जय वैष्णवी महरानी। कृपा करहु मात कल्याणी॥
दास जानि मोहिं गोद लगाओ। जन्म मरण का कष्ट मिटाओ॥
सदा सहाय रहहु सुखदानी। जय जय जय माँ वैष्णो रानी॥
भक्त जनों के काज सँवारो। विपदा हरो कष्ट निवारो॥
प्रेम सहित बोलो जयकारा। वैष्णो मात करे उधारा॥
सकल सुमंगल दायक माता। जय जय जय वैष्णवी त्राता॥
नमो नमो हे मात भवानी। जय वैष्णो महारानी॥
वैष्णो देवी चालीसा जो, नियम से नित नित गाय।
मनवांछित फल पाय सो, सब संताप नशाय॥