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BHAKTI KI SHAKTI
🪷
🪷 भगवान ब्रह्मा

श्री ब्रह्मा चालीसा

सकल सृष्टि के रचयिता, चतुर्मुख व वेदों के ज्ञाता स्वयंभू भगवान ब्रह्मा की वंदना।

📅 शुभ दिन: रविवार, कार्तिक पूर्णिमा, पुष्कर मेला, ब्रह्म मुहूर्त 📜 40 सिद्ध चौपाइयां
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॥ दोहा ॥

जय ब्रह्मा जय स्वयम्भू, चतुरानन सुखमूल।

करहु कृपा निज दास पै, रहहु सदा अनुकूल॥

तुम सृजक ब्रह्माण्ड के, अज विधि धाता नाम।

विश्वविधाता कीजिये, जन पै कृपा ललाम॥

॥ चौपाई (1 से 40) ॥
1

जय जय कमलासन जगमूला। रहहु सदा जनपै अनुकूला॥

2

रुप चतुर्भुज परम सुहावन। तुम्हें अहैं चतुर्दिक आनन॥

3

रक्तवर्ण तव सुभग शरीरा। मस्तक जटाजूट गंभीरा॥

4

ताके ऊपर मुकुट बिराजै। दाढ़ी श्वेत महाछवि छाजै॥

5

श्वेतवस्त्र धारे तुम सुन्दर। है यज्ञोपवीत अति मनहर॥

6

कानन कुण्डल सुभग बिराजहिं। गल मोतिन की माला राजहिं॥

7

चारिहु वेद तुम्हीं प्रगटाये। दिव्य ज्ञान त्रिभुवनहिं सिखाये॥

8

ब्रह्मलोक शुभ धाम तुम्हारा। अखिल भुवन महँ यश बिस्तारा॥

9

अर्द्धांगिनि तव है सावित्री। अपर नाम हिये गायत्री॥

10

सरस्वती तब सुता मनोहर। वीणा वादिनि सब विधि मुन्दर॥

11

कमलासन पर रहे बिराजे। तुम हरिभक्ति साज सब साजे॥

12

क्षीर सिन्धु सोवत सुरभूपा। नाभि कमल भो प्रगट अनूपा॥

13

तेहि पर तुम आसीन कृपाला। सदा करहु सन्तन प्रतिपाला॥

14

एक बार की कथा प्रचारी। तुम कहँ मोह भयेउ मन भारी॥

15

कमलासन लखि कीन्ह बिचारा। और न कोउ अहै संसारा॥

16

तब तुम कमलनाल गहि लीन्हा। अन्त बिलोकन कर प्रण कीन्हा॥

17

कोटिक वर्ष गये यहि भांती। भ्रमत भ्रमत बीते दिन राती॥

18

पै तुम ताकर अन्त न पाये। लै निराश अतिशय दुःखियाये॥

19

पुनि बिचार मन महँ ठकुराया। हरि को सुमिरन तबहिं कराया॥

20

प्रगट भये तब श्री भगवन्ता। जिनके चरन कमल भगवन्ता॥

21

चतुर्भुज रूप दिखायो माता। तब तुम कहँ हरिग्यान कराता॥

22

निज इच्छा प्रभु रूप बखाना। ब्रह्मा विष्णु महेश बखाना॥

23

हम पालन करिहैं संसारा। शिव संहार करहिं सब केरा॥

24

हम तीनहुँ कहँ काज धनेरा। अगुणरुप श्री ब्रह्मा बखानहु॥

25

निराकार तिनकहँ तुम जानहु। हम साकार रुप त्रयदेवा॥

26

करिहैं सदा ब्रह्म की सेवा। यह सुनि ब्रह्मा परम सिहाये॥

27

परब्रह्म के यश अति गाये। सो सब विदित वेद के नामा॥

28

मुक्ति रुप सो परम ललामा। यहि विधि प्रभु भो जनम तुम्हारा॥

29

पुनि तुम प्रगट कीन्ह संसारा। नाम पितामह सुन्दर पायेउ॥

30

जड़ चेतन सब कहँ निरमायेउ। लीन्ह अनेक बार अवतारा॥

31

सुन्दर सुयश जगत विस्तारा। देवदनुज सब तुम कहँ ध्यावहिं॥

32

मनवांछित तुम सन सब पावहिं। जो कोउ ध्यान धरै नर नारी॥

33

ताकी आस पुजावहु सारी। पुष्कर तीर्थ परम सुखदाई॥

34

तहँ तुम बसहु सदा सुरराई। कुण्ड नहाइ करहि जो पूजन॥

35

ता कर दूर होई सब दूषण। जो यह पढ़ै ब्रह्मा चालीसा॥

36

होय सुखी जन कहँ गौरीसा। ब्रह्मा जी की कृपा जो पावै॥

37

सब जग में वह मान बढ़ावै। ज्ञान बुद्धि विद्या बल पावै॥

38

विपदा टरे सकल सुख आवै। आयुरोग्य यश कीर्ति प्रकाशा॥

39

पूरण होहिं सकल अभिलाषा। पितामह की कृपा से होई॥

40

जय चतुरानन जय जगकर्ता। भक्त जनों के संकट हर्ता॥

॥ समापन दोहा ॥

पुष्कर वास विधाता के, चरनन शीश नवाय।

ब्रह्मा जी की कृपा से, सकल मनोरथ पाय॥

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Vedic Exposition & Meaning · स्तोत्र भावार्थ व संपूर्ण सारांश

Divine Meaning & English Summary of Shri Brahma Chalisa

This sacred 40-verse hymn is dedicated to Lord Brahma (The Creator), praising their divine attributes, celestial pastimes, and protective boons. Composed in authentic Vedic tradition, it serves as a devotional bridge connecting the human soul to divine grace.

✨ Thematic Verse Journey & Spiritual Essence

✦ Sacred Invocations & Dhyana

Meditates upon the cosmic form, celestial weapons, and luminous aura of Lord Brahma (The Creator).

✦ Divine Feats & Lilas

Sings the heroic and compassionate deeds performed to protect righteousness (Dharma) and liberate devotees.

✦ Blessings & Fruits

Bestows peace, dispels fear, resolves worldly crises, and guides the practitioner toward spiritual bliss.

🌟 Daily Chanting Fruits & Spiritual Benefits (फलश्रुति)

Regular daily recitation with sincere devotion creates a positive energetic vibration, clears ancestral and planetary hurdles, and fills life with auspicious grace.

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चालीसा पाठ विधि एवं नियम

प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में स्नान कर पीले वस्त्र धारण करें। भगवान ब्रह्मा के पुष्कर स्वरूप या हंसवाहिनी प्रतिमा का ध्यान करें। चंदन, पीले पुष्प व पंचमेवा अर्पित कर ॐ ब्रह्मणे नमः का जप करते हुए चालीसा का पाठ करें।

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चालीसा पाठ के चमत्कारी लाभ

ज्ञान, मेधा, स्मरण शक्ति और बौद्धिक कौशल में वृद्धि होती है। वाणी में तेज आता है तथा जीवन में सृजन और निर्णय क्षमता प्रबल होती है। प्रारब्ध कर्मों के दोष शांत होते हैं।