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BHAKTI KI SHAKTI
📜 भगवान जगन्नाथ (पुरी) • 9 श्लोक

श्री जगन्नाथाष्टकम्

आदि शंकराचार्य द्वारा श्रीक्षेत्र पुरी धाम में रचित यह अष्टक भगवान जगन्नाथ की प्रत्यक्ष कृपा, नेत्र दृष्टि में प्रभु दर्शन और मोक्ष प्राप्ति की परम प्रार्थना ("जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे") है।

रचयिता जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
स्रोत / ग्रन्थ पुरी जगन्नाथ माहात्म्य (स्कन्द पुराण)
छन्द शिखरिणी छन्द
शुभ दिन / मुहूर्त रथयात्रा, पूर्णिमा, गुरुवार
श्लोक 1 ॥ श्री ॥
कदाचित् कालिन्दीतटविपिनसङ्गीततरलो मुदाभीरीनारीवदनकमलास्वादमधुपः । रमाशम्भुब्रह्मामरपतिगणेशार्चितपदो जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे ॥ १ ॥
हिंदी भावार्थ: जो कभी यमुना तट के कुंजों में वंशी की मधुर तान छेड़ते हैं, जो ब्रज की गोपियों के मुखकमल के रस का पान करने वाले भौंरे हैं, और जिनके चरणों की पूजा लक्ष्मी, शिव, ब्रह्मा, इन्द्र और गणेश करते हैं; वे संपूर्ण जगत के स्वामी श्री जगन्नाथ मेरे नयनों के मार्ग में प्रकट हों।
English Translation: Who playfully plays melodies in the groves by the Yamuna, a bee tasting the lotus faces of the cowherd maidens, whose feet are revered by Lakshmi, Shiva, Brahma, Indra, and Ganesha—may that Lord of the Universe, Jagannatha, become the object of my vision.
श्लोक 2 ॥ श्री ॥
भुजे सव्ये वेणुं शिरसि शिखिपिच्छं कटितटे दुकूलं नेत्रान्ते सहचरकटाक्षं विदधते । सदा श्रीमद्बृन्दावनवसतिलीलापरिचयो जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे ॥ २ ॥
हिंदी भावार्थ: बाएं हाथ में बांसुरी, सिर पर मोरपंख, कमर में पीताम्बर और नेत्रों के कोनों से अपने सखाओं पर स्नेहमयी दृष्टि डालने वाले तथा वृन्दावन में नित्य लीला करने वाले भगवान जगन्नाथ मेरे नयनों के सामने प्रकट हों।
English Translation: Holding the flute in His left arm, peacock feather on His crown, fine silks around His waist, casting loving sidelong glances at His companions, immersed in the pastimes of Vrindavan—may Lord Jagannatha become visible to my eyes.
श्लोक 3 ॥ श्री ॥
महाम्भोधिस्तीरे कनकरुचिरे नीलशिखरे वसन् प्रासादान्तः सहजबलभद्रेण बलिना । सुभद्राकल्याणा सकलजनसेवाय च विभुर्जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे ॥ ३ ॥
हिंदी भावार्थ: महासमुद्र के तट पर स्वर्णमयी आभा वाले नीलगिरि शिखर पर स्थित भव्य मन्दिर में अपने बलवान भाई बलभद्र और कल्याणमयी बहन सुभद्रा के साथ समस्त जगत के कल्याण हेतु विराजने वाले श्री जगन्नाथ मेरे नयन-पथ में आएं।
English Translation: Residing upon the golden-hued Nilachala crest by the shores of the great ocean, within His grand temple alongside mighty Balabhadra and auspicious Subhadra to bless all beings—may Lord Jagannatha become visible to my eyes.
श्लोक 4 ॥ श्री ॥
कृपापारावारः सजलजलदश्रेणिरुचिरो रमावाणीरामः स्फुरदमलपद्मेक्षणयुगः । सुरेन्द्रैराराध्यः श्रुतिगणशिखागीतचरितो जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे ॥ ४ ॥
हिंदी भावार्थ: करुणा के अगाध सागर, सजल मेघों के समान सुंदर श्याम वर्ण वाले, लक्ष्मी और सरस्वती को आनंद देने वाले, खिले हुए निर्मल कमल सदृश युगल नेत्रों वाले, देवराजों द्वारा पूजित और वेदों के उपनिषदों द्वारा गाये जाने वाले जगन्नाथ मेरे नयनों में बसें।
English Translation: An ocean of compassion, enchanting like rainclouds, delight of Lakshmi and Saraswati, with eyes blooming like spotless lotuses, adored by the celestials and sung in the peaks of the Vedas—may Lord Jagannatha become visible to my eyes.
श्लोक 5 ॥ श्री ॥
रथारूढो गच्छन् पथि मिलितभूदेवपटलैः स्तुतिप्रादुर्भावं प्रतिपदमुररीकृत्य सदयः । दयासिन्धुर्बन्धुः सकलजगतां सिन्धुसुतया जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे ॥ ५ ॥
हिंदी भावार्थ: रथयात्रा में रथ पर सवार होकर चलते समय एकत्र हुए भक्तों और विप्रों की स्तुतियों को पद-पद पर दयापूर्वक स्वीकार करने वाले, दया के सिंधु और समस्त जगत के बंधु जगन्नाथ जी समुद्रतनया लक्ष्मी सहित मेरे नयन-पथ में आएं।
English Translation: Mounted on His chariot during Ratha Yatra, graciously accepting the spontaneous prayers of devoted gatherings at every step, ocean of mercy and friend of the universe together with Lakshmi—may Lord Jagannatha become visible to my eyes.
श्लोक 6 ॥ श्री ॥
परब्रह्मापीडः कुवलयदलोत्फुल्लनयनो निवासी नीलाद्रौ निहितचरणोऽनन्तशिरसि । रसानन्दी राधासरसवपुरालिङ्गनसुखो जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे ॥ ६ ॥
हिंदी भावार्थ: जो परब्रह्म के मुकुटमणि हैं, नीलकमल की पंखुड़ी जैसे प्रफुल्ल नेत्रों वाले हैं, नीलाचल धाम में निवास करते हैं, जिनके चरण शेषनाग के फन पर स्थित हैं, और जो प्रेमानंद रस में मग्न हैं; वे जगन्नाथ मेरे नयनों के सामने प्रकट हों।
English Translation: Crest-jewel of the Supreme Brahman, with eyes like blooming blue water-lilies, dwelling on the Niladri hills, resting His feet upon the hoods of Ananta Shesha, steeped in blissful divine love—may Lord Jagannatha become visible to my eyes.
श्लोक 7 ॥ श्री ॥
न वै याचे राज्यं न च कनकमाणिक्यविभवं न याचेऽहं रम्यां सकलजनकाम्यां वरवधूम् । सदा काले काले प्रमथपतिना गीतचरितो जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे ॥ ७ ॥
हिंदी भावार्थ: हे प्रभु! मैं न राज्य मांगता हूँ, न स्वर्ण-माणिक्य आदि धन-वैभव, और न ही संसार को लुभाने वाली रूपवती स्त्री; मेरी तो केवल यही अभिलाषा है कि शिवजी द्वारा गाए गए चरित्र वाले भगवान जगन्नाथ मेरे नयनों में सदा बसें।
English Translation: I ask neither for a kingdom, nor for riches of gold and rubies, nor for a lovely consort desired by worldly souls; my only prayer is that Lord Jagannatha, whose glories are sung by Lord Shiva, may forever be visible to my eyes.
श्लोक 8 ॥ श्री ॥
हर त्वं संसारं द्रुततरमसारं सुरपते हर त्वं पापानां विततिमपरां यादवपते । अहो दीनेऽनाथे निहितचरणो निश्चितमिदं जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे ॥ ८ ॥
हिंदी भावार्थ: हे देवराज! इस असार संसार के दुःखों को शीघ्र हर लीजिए। हे यदुपते! मेरे अपार पापों के समूह को नष्ट कर दीजिए। आप दिनों और अनाथों पर कृपा करने वाले हैं; हे प्रभु जगन्नाथ! मेरे नयन-पथ में प्रकट होइए।
English Translation: Quickly remove this hollow worldly transmigration, O Lord of celestials! Destroy my vast accumulation of sins, O King of the Yadus! Ever benevolent to the humble and protectorless, O Lord Jagannatha, become the object of my vision.
फलश्रुति 9 ॥ श्री ॥
जगन्नाथाष्टकं पुण्यं यः पठेत् प्रयतः शुचिः । सर्वपापविशुद्धात्मा विष्णुलोकं स गच्छति ॥ ९ ॥
हिंदी भावार्थ: जो मनुष्य पवित्र और एकाग्रचित्त होकर इस पावन जगन्नाथाष्टकम् का पाठ करता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर अंत में परम पावन विष्णुलोक को प्राप्त होता है।
English Translation: Whoever with self-control and purity recites this sacred Jagannatha Ashtakam becomes purified of all sins and ascends to the eternal realm of Lord Vishnu.
✨ समाप्ति
।। इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं श्रीजगन्नाथाष्टकं सम्पूर्णम् ।।

🪔 प्रामाणिक पाठ विधि एवं नियम

  • 1 स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  • 2 भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी के सम्मुख घी का दीप जलाएं।
  • 3 तुलसी पत्र, पुष्प और महाप्रसाद अर्पित करें।
  • 4 हाथ जोड़कर भक्ति भाव से सस्वर पाठ करें।

✨ फलश्रुति एवं अलौकिक लाभ

  • ✔ समस्त संचित पापों का नाश और श्री जगन्नाथ जी का साक्षात्कार।
  • ✔ जीवन के अंतिम समय में भगवत्स्मरण और मोक्ष की प्राप्ति।
  • ✔ परिवार में ऐश्वर्य, आरोग्यता और आधि-व्याधि से रक्षा।
🗓️ शुभ वार व मुहूर्त: रथयात्रा, पूर्णिमा, गुरुवार