ॐ जय कलाधारी हरे, स्वामी जय पौणाहारी हरे। भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥ ॐ जय कलाधारी हरे॥
ॐ जय कलाधारी हरे, स्वामी जय पौणाहारी हरे। भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥
दूधाहारी दयालु, शाहतलाई वासा। रोट का भोग लगे, पूरण हो आशा॥
अमर गुफा में ध्यान धरत, शिव का अवतार। चिमटा त्रिशूल सोहे, महिमा अपरम्पार॥
माता रत्नो की गऊ चराई, बारह वर्ष बिताए। छाछ और रोटी को, पल में प्रगट कराए॥
गरुड़ पर असवार होके, धूणे को प्रगटाया। सिद्धों के सरताज, जग का दुःख मिटाया॥
जो नर निशदिन ध्यावे, श्रद्धा भाव धरे। मनवांछित फल पाकर, भवसागर तरे॥
आरती बाबा बालकनाथ की, जो कोई नर गावे। सुख सम्पति आनन्द, निशदिन सो पावे॥
ॐ जय कलाधारी हरे, स्वामी जय पौणाहारी हरे। भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥
ॐ जय कलाधारी हरे, स्वामी जय पौणाहारी हरे। भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥ ॐ जय कलाधारी हरे॥