शिव कामा सुंदरी अष्टकं || Shivakama Sundari Ashtakam || 

पुण्डरीक पुरा मध्य वसिनिं, नृथ राज सह ध्गर्मिनिं ।
अध्रि राज थानयां, धिने धिने चिन्थयामि शिवकामा सुन्दरीं ॥१॥

ब्रह्म विष्णु धाम देव पूजिथं, बहु स्रीपद्म सुक वथस शोबिथं ।
बहुलेय कलपन नथ्मजं, धिने धिने चिन्थयामि शिवकामा सुन्दरीं ॥२॥

वेद शीर्ष विनुथ आत्मा वैभवं, वन्चिथर्थ फल धन ततःपरं ।
व्यास सूनु मुखथपर्चिथं, धिने धिने चिन्थयामि शिवकामा सुन्दरीं ॥३॥

शोदसर्न पर देवथं उमां, पञ्च बन अनिस योथ्भव वेशनां ।
परिजथ थारु मूल मण्डपं, धिने धिने चिन्थयामि शिवकामा सुन्दरीं ॥४॥

विस्वयोनिम् अमलं अनुथामं, वग विलास फलधं विचक्षणं ।
वारि वह सधृस लम्बरं, धिने धिने चिन्थयामि शिवकामा सुन्दरीं ॥५॥

नन्दिकेस विनुथ अथम वैभवं, श्र्व नममन्थु जपक्रुतः सुख प्रदं ।
नास हीन पथथं, नदेस्वरिम्, धिने धिने चिन्थयामि शिवकामा सुन्दरीं ॥६॥

सोमे सूर्य हुथ बुक्थाभिर लोचनं, सर्व मोहन करीं सुधीदिनां ।
थ्री वर्ग परमाथम सोउख्य्थां, धिने धिने चिन्थयामि शिवकामा सुन्दरीं ॥७॥

पुण्डरीक चरण ऋषिणा कर्थं स्तोत्रं, येथातः अन्वहम् पदन्थि ये ।
पुण्डरीक पुरा नयिकं अम्बिकं, य दृष्टिं अकिलं महेस्वरि ॥८॥

Shiva Kama Sundari Ashtakam

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