योग में कहा गया है कि मनुष्य की सबसे बड़ी समस्या है 'चित्त की वृत्तियां' ,यह संचित कर्म ही हमारा प्रारब्ध भी होते हैं और इसी से आगे की दिशा भी तय होती है। 

सूक्ष्म शरीर के द्वारा ही हम दूसरे के शरीर में प्रवेश कर सकते हैं। इस चित्त की पांच अवस्थाएं होती है जिसे समझ कर ही हम सूक्ष्म शरीर को सक्रिय कर सकते हैं। 

इस चित्त या मानसिक अवस्था के पांच रूप हैं प्रत्येक अवस्था में कुछ न कुछ मानसिक वृत्तियों का निरोध होता है।

इंसान के शरीर में कुंडलिनी शक्ति को जागृत करने के लिए चक्र होते हैं। योग करते समय कहाँ रहे हमारा ध्यान केंद्र बिंदु
चक्रों को खोलने और संतुलन के लिए योग




ज्यादातर लोग सोचते हैं कि मंत्र, माला, पूजा-पाठ ही सबसे बड़ा और एकमात्र साधन है परमात्मा से जुड़ने का या परमात्मा को पाने का । 

वो ये नहीं जानते की ये सब करते हुए उनका मन, उनकी आत्मा सब संसार में होते हैं या गृहस्थ जीवन की कमियों की पूर्ती की ओर होता है। 

जबकि ध्यान करते वक्त हमारी अन्तरात्मा परमात्मा से जुड़ने के लिए अग्रसर होती है और एक वक्त ऐसा आता है जब परमात्मा से हमारा संबंध इस कदर जुड़ जाता है कि इंसान गृहस्थ होकर भी उस परमात्मा से जब चाहे जहाँ चाहे बात कर सकता है। क्योंकि ध्यान का सही अर्थ है अन्तरात्मा को परमात्मा से जोड़ना ।

अगर परमात्मा को खोजना है तो आत्मा रुपी दीप जलाकर मन रुपी मंदिर में खोजो। परमात्मा कहीं बाहर नहीं, किसी मंदिर-मस्जिद में नहीं, अपितु आपके अंदर ही हैं। 

जैसे ही दीप जलाओगे मन का अन्धकार ख़त्म होगा और दीप की रोशनी से परमात्मा को देख पाओगे। उस वक्त जो पाओगे वो आप चाहे कितने ही जाप या पूजा-पाठ और मन्त्र करो नहीं पा सकते।

मूढ़ : मूढ़ अवस्था में निद्रा, आलस्य, उदासी, निरुत्साह आदि प्रवृत्तियों या आदतों का बोलबाला रहता है।

क्षिप्त: अवस्था में चित्त एक विषय से दूसरे विषय पर लगातार दौड़ता रहता है। ऐसे व्यक्ति में विचारों, कल्पनाओं की भरमार रहती है।

विक्षिप्त : विक्षिप्तावस्था में मन थोड़ी देर के लिए एक विषय में लगता है पर क्षण में ही दूसरे विषय की ओर चला जाता है। पल प्रति‍पल मानसिक अवस्था बदलती रहती है।

निरुद्व : निरुद्व अवस्था में चित्त की सभी वृत्तियों का लोप हो जाता है और चित्त अपनी स्वाभाविक स्थिर, शान्त अवस्था में आ जाता है। 

अर्थात व्यक्ति को स्वयं के होने का पूर्ण अहसास होता है। 

उसके उपर से मन, मस्तिष्क में घुमड़ रहे बादल छट जाते हैं और वह पूर्ण जाग्रत रहकर दृष्टा बन जाता है। यह योग की पहली समाधि अवस्था भी कही गई है। 


निरुद्व: अवस्था को समझें यह व्यक्ति को आत्मबल प्रदान करती है। यही व्यक्ति का असली स्वरूप है। 

इस अवस्था को प्राप्त करने के लिए सांसार की व्यर्थ की बातों, क्रियाकलापों आदि से ध्यान हटाकर संयमित भोजन का सेवन करते हुए प्रतिदिन ध्यान करना आवश्यक है। 

इस दौरान कम से कम बोलना और लोगों से कम ही व्यवहार रखना भी जरूरी है।

एकाग्र : एकाग्र अवस्था में चित्त देर तक एक विषय पर लगा रहता है। यह अवस्था स्थितप्रज्ञ होने की दिशा में उठाया गया पहला कदम है।



अध्यात्म के जगत का सबसे बड़ा सूत्र है समर्पण । समर्पण मतलब पूर्ण स्वीकार जो भी होगा, जीवन में अच्छा या बुरा सब मुझे स्वीकार है ।

 एक साहस चाहिये फिर बिना कुछ करे ही भाव करते ही जीवन में क्रांति घटित होती है । कुछ भी घटे जीवन में पूर्ण स्वीकार । जो हो रहा है उसे देखते रहिये । 

ये न सोचो ये ठीक हुआ, ये न सोचो ये गलत हुआ, जो हुआ बस उसे देखो, किसी भी अच्छी या बुरी घटना के प्रति कोई भी प्रतिक्रिया नही । 

सात दिन अपने आप को पूरी तरह से परमात्मा को सौफ दो ये एक प्रयोग करके देखिये । पूरा का पूरा जीवन परिवर्तित हो जायेगा । 

असीम आनन्द दिन प्रतिदिन बढ़ता जायेगा । अपनी सारी चिंताओं को ईश्वर को समर्पित कर दो । अपने आप को पूर्णतः ईस्वर को समर्पित कर दो ।


पूर्ण समर्पण कर ये मत सोचो की क्या होगा । पूर्ण समर्पण करो अपने आप का । 

पूर्ण समर्पण करते ही अनन्त आनंद, या ध्यान की घटना अपने आप घटने लगेगी ।सौफ दो अपने आप को परमात्मा के हाथों में । 

अगर जरा सा भी, इंच भर भी कुछ सोचा, तो ये फिर समर्पण नही । इंच भर भी कुछ न सोचो, पूर्ण समर्पण में ध्यान की घटना अपने आप घटने लगती है । 

कुछ भी सोचने का मतलब की अभी समर्पण नही हुआ है । पूर्ण समर्पण जीवन का सबसे बड़ा सूत्र है । 

समर्पण करते ही, उसी समय तुरन्त ही असीम आनन्द भीतर बढ़ता ही चला जायेगा ।

 पूर्ण समर्पण में ही परमात्मा की महान कृपाओं का पता चलता है । पूर्ण समर्पण मे है परम् आनन्द ।


*क्या है ईश्वर या प्रभुत्व को प्राप्त करना ?*


प्रभुत्व प्राप्त करने से प्रायः हम समझ बैठते हैं कि अपने इष्ट को प्राप्त कर लिया परंतु यह सत्य नहीं है। 

प्रभुत्व को प्राप्त करने के लिए अपनत्व को प्राप्त करना आवश्यक है तभी प्रभुत्व की प्रत्यक्ष प्राप्ति संभव है।


क्योंकि,इस ब्रह्मांड में जितना भी ज्ञान तथा शक्ति है वह हम सभी या यूं कहें कि हर चर अचर में निहित है। 

यह कार्यप्रणाली बहुत ही व्यवस्थित तथा सुलझी हुई है जो आरम्भ से अंत तक नहीं बदलेगी। इस सम्पूर्ण सृष्टि में जो भी हुआ, हो रहा है या होना है पूर्वनिर्धारित है और इसमें नाममात्र का ही बदलाव हो सकता है, जब यह बदलाव होता है तब प्रलय ही आता है।

जब हमें अपनत्व या अपनी अंतरात्मा की पूर्ण रूप से प्राप्ति होती है तब हमारा अवचेतन जाग्रत हो जाता है।

हमारे अवचेतन में इस ब्रह्मांड की हर घटना तथा ज्ञान का उल्लेख पहले से ही है क्योंकि हम उस परमज्योति का ही अभिन्न अंग हैं, यह सब कुछ हमारे अवचेतन में निहित होने के कारण जाग्रति के बाद हम भविष्य की हर घटना को बता भी सकते हैं और शक्तीयों का उपयोग भी कर सकते हैं।

कुछ साधकों में शक्ति को पाने की लालसा, भविष्य को देखने की लालसा या इच्छापूर्ति की लालसा हमें पूर्ण जाग्रति तक नहीं जाने देती। 

यहां तक की हमारे मन के भाव भी हमें अवरोधित करते हैं परम्आनंद की प्राप्ति तक पहुंचने में। 

जब हमें अनुभव या अनुभूतियाँ होती हैं तो हमारा मन प्रभु के प्रति इतना समर्पित हो उठता है कि हम उससे ऊपर उस निराकार ब्रह्म को भुला बैठते हैं और खो जाते हैं किसी साकार रूप में। 

परंतु जब हमें इसका ज्ञान होता है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है क्योंकि अनुभवों के अभाव में मन शंकित हो उठता है। 

हम भूल जाते हैं वह परमसत्य जो प्रभु ने कई प्रकार के मार्गों द्वारा हमें बताया, हम अटक जाते हैं सिद्धियों, शक्तीयों, श्रद्धा तथा भाव में, भुला देते हैं उस परमसत्ता को जो निराकार रूप में हमारी प्रतीक्षा कर रही है। 

वह परमज्योति जिसने धारण किये कितने ही रूप, अवतार तथा योनिया, ताकि हम बढ़ सकें उनका हाथ थाम कर उस सीढ़ी पर जो लेकर जाएगी हमें हमारे गंतव्य तक और यह तो सभी को पता है कि गन्तव्य क्या है?

हम शंकित हो उठते हैं जब हमें अनुभव नहीं होते परंतु क्या कुण्डलिनी जागरण केवल अनुभव द्वारा सम्भव है, नहीं। 

क्या प्रार्थना, भाव, योग, श्रद्धा आदि आपको ब्रह्म तक की यात्रा पूर्ण करवाएंगे, नहीं, अपितु सहायक होंगे आपके जीवन में ताकि आप जप तप करके ध्यान की हर अवस्था को पार कर ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर सकें। 

ब्रह्मज्ञान जो निहित है हमारे मस्तिष्क के अवचेतन भाग में।

संक्षिप्त में, अपने अंदर छुपे ज्ञान को प्राप्त करना ही अपनत्व को प्राप्त करना है और जैसा ऊपर लिखा है हमारे अवचेतन में सबकुछ निहित है तो आप अपनत्व को प्राप्त करते ही प्रभुत्व को प्रत्यक्ष प्राप्त कर लेंगे।

हमारी चेतना या हमारा चैतन्य रूप ही उस परमशक्ति को प्राप्त करता है जिसे हम परमात्मा कहते हैं, यदि हम चैतन्य नहीं होंगे तो अनुभवों तक ही अटक जाएंगे और कभी मुक्ति प्राप्त नहीं होगी। अपने चैतन्य स्वरूप को प्राप्त कर ही ईश्वर की प्राप्ति संभव है।

पूजन के समय ज्योत क्यो जलाते है??

जब हम पूजा करते हैं तब उस स्थल को पवित्र करने के लिए सबसे सरल विधि होती है ज्योत या दिया लगाना। क्योंकि अग्नि का कार्य है भस्म करना और प्रकाश देना। 

जब ज्योत जलाते हैं तो अणु तत्व से लेकर नकारात्मक शक्ति तक का प्रभाव अग्नि नष्ट कर देती है और सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करती है जिससे स्थल स्वयम ही पवित्र हो जाता है।


दूसरा परमात्मा का निराकार स्वरूप एक ज्योत के ही समान है, जब हम दिया जलाते हैं तब हम अनजाने ही परमात्मा के निराकार स्वरूप की पूजा भी कर रहे होते हैं 

साधना मार्ग क्या है?

साधना मार्ग वो मार्ग है जिस पर चलकर शीघ्रता से परमात्मा की तरफ बढ़ा जा सकता है 

उस परम तत्व का अनुभव किया जा सकता है , उनकी शक्तियों का अनुभव उनके सानिध्य का अनुभव सहजता से ही प्राप्त हो जाता है ,बस इंसान में श्रद्धा भाव होना चाहिए तो मंजिल दूर नही होती । 

जो साधना मार्ग पर सिर्फ शक्तियों और सिद्धि पाने के लिए आता है उसका जीवन इन सबको प्राप्त करने में ही निकल जाता है और अंत समय मे कुछ हाथ नही आता , अगर हम बिना किसी इच्छा के साधना मार्ग पर बढ़ते है

 तो सबकुछ सयम ही मिल जाता है कुछ मांगने की आवश्यकता ही नही रहती , लेकिन आज के समय मे अप्सरा , यक्षणियो के पीछे लोग पागल हुए घूम रहे है , जबतक मन शुद्ध नही होगा तबतक आप एक साधरण से प्रेत को भी नही बुला सकते , अप्सरा यक्षणी , देव तो बहुत दूर की बात है । 

आज के पढ़े लिखे लोगो को ये सब अंधविस्वास लगता है लेकिन ये अकाट्य सत्य है जिन्होंने इनका अनुभव किया है वो इन चीजों को भली भांति जानते है  

जो बिना जाने ही अंधविस्वास कह देते है उनके लिए ये कुछ भी नहीं क्योकि उन्होंने कभी अनुभव किया नही इस सब चीजों को , हमारे साथ जुड़े बहुत से लोगो ने इनका प्रत्यक्ष अनुभव किया है 

अपने जीवन मे जैसा कि , हमने कुछ लोगो के अनुभव पोस्ट भी किये पेज पर , ये सब भी बाकी सभी की तरह थे , लेकिन पहले इन्होंने जाना कि ये सत्य होता है या नही , लेकिन उन्होंने पाया कि सब सत्य है । 

भौतिकता से निकलकर जो परम् शांति मिलती है वो बस यही है इसी क्षण में है बाकी सबकुछ उस क्षण के आगे व्यर्थ है , और ये क्षण बहुत से लोगो ने अनुभव किया है , जीवन मे बदलाव आया है  

आज के समय मे लोगो ने भौतिक सुख तो बहुत पा लिया लेकिन इसके साथ मन की शांति खो दी , जिसको लगे अंधविस्वास है वो एक बार साधना मार्ग पर आकर इसका अनुभव करे कि क्या सही में अंधविस्वास है या आपका भर्म है ।

।। हर हर महादेव ।।

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